» वैदिक सनातन धर्ममें ऐसा क्यों
 
वैदिक सनातन धर्ममें ऐसा क्योंhttp://www.bestastroguru.com/articles/1373285320sanatan.jpg

१.     प्रात: व संध्याकाल दोनों समय आरती क्यों करनी चाहिए ?

`सूर्योदयके समय ब्रह्मांडमें देवताओंकी तरंगोंका आगमन होता है । जीवको इनका स्वागत आरतीके माध्यमसे करना चाहिए । सूर्यास्तके समय राजसी-तामसी तरंगोंके उच्चाटन हेतु जीवको आरतीके माध्यमसे देवताओंकी आराधना करनी चाहिए । इससे जीवकी देहके आस-पास सुरक्षाकवच निर्माण होता है।

२.     देवताकी पूर्ण गोलाकार आरती ही क्यों उतारें?

`पंचारतीके समय आरतीकी थालीको पूर्ण गोलाकार घुमाएं । इससे ज्योतिसे प्रक्षेपित सात्त्विक तरंगें गोलाकार पद्धतिसे गतिमान होती हैं । आरती गानेवाले जीवके चारों ओर इन तरंगोंका कवच निर्माण होता है । इस कवचको `तरंग कवच' कहते हैं । जीवका ईश्वरके प्रति भाव जितना अधिक होगा, उतना ही यह कवच अधिक समयतक बना रहेगा । इससे जीवके देहकी सात्त्विकतामें वृद्धि होती है और वह ब्रह्मांडकी ईश्वरीय तरंगोंको अधिक मात्रामें ग्रहण कर सकता है ।

३.     कर्पूर-आरतीके पश्चात् देवताओंके नाम का जयघोष क्यों करना चाहिए?

`उद्घोष' यानी जीवकी नाभिसे निकली आर्त्त पुकार । संपूर्ण आरतीसे जो साध्य नहीं होता, वह एक आर्त्त भावसे किए जयघोषसे साध्य हो जाता है ।

•             आरतीके पूर्व तीन बार शंख क्यों बजाना चाहिए ?

•             विधियुक्त आरती ग्रहण करनेका अर्थ क्या है ?

•             परिक्रमा लगानेंके पश्चात् नमस्कार करनेसे क्या लाभ होता है?

•             आरती ग्रहण करनेके उपरांत `त्वमेव माता, पिता त्वमेव' प्रार्थना बोलें । आरती ग्रहण करनेके उपरांत `त्वमेव माता, पिता त्वमेव' प्रार्थना क्यों बोलना चाहिए?