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|| Pranayama Mantra (प्राणायाम मंत्र) ||
 

ॐ भूः । ॐ भूवः । ॐ स्वः । ॐ महः । ॐ जनः ॐ तपः । ओम् सत्यं ।

 

 

इष्ट सिद्धि हेतु इष्टदेवता के ‘कुल्लुकादि मंत्रों’ का जप अत्यन्त आवश्यक हैं ।
अज्ञात्वा कुल्लुकामेतां जपते योऽधमः प्रिये ।
पञ्चत्वमाशु लभते सिद्धिहानिश्च जायते ।।
दश महाविद्याओं के कुल्लिकादि अलग-अलग हैं । काली के कुल्लुकादि इस प्रकार हैं -
कुल्लुका मंत्र -
क्रीं, हूं, स्त्रीं, ह्रीं, फट् यह पञ्चाक्षरी मंत्र हैं । मूलमंत्र से षडङ्ग-न्यास करके शिर में १२ बार कुल्लुका मंत्र का जप करें ।
सेतुः-
“ॐ” इस मंत्र को १२ बार हृदय में जपें । ब्राह्मण एवं क्षत्रियों का सेतु मंत्र “ॐ” हैं । वैश्यों के लिये “फट्” तथा शूद्रों के लिये “ह्रीं” सेतु मंत्र हैं । इसका १२ बार हृदय में जप करें ।
महासेतुः-
“क्रीं” इस महासेतु मंत्र को कण्ठ-स्थान में १२ बार जप करें ।
निर्वाण जपः-
मणिपूर-चक्र (नाभि) में - ॐ अं पश्चात् मूलमंत्र के बाद ऐं अं आं इं ईं ऋं ॠं लृं ॡं एं ऐं ओं औं अं अः कं खं गं घं ङ चं छं जं झं ञं टं ठं डं ढं णं तं थं दं धं नं पं फं बं भं मं यं रं लं वं शं षं सं हं ळं क्षं ॐ का जप करें । पश्चात् “क्लीं” बीज को स्वाधिष्ठान चक्र में १२ बार जप करें । इसके बाद “ॐ ऐं ह्रीं शऽरीं क्रीं रां रीं रुं रैं रौं रं रः रमल वरयूं राकिनी मां रक्ष रक्ष मम सर्वधातून् रक्ष रक्ष सर्वसत्व वशंकरि देवि ! आगच्छागच्छ इमां पूजां गृह्ण गृह्ण ऐं घोरे देवि ! ह्रीं सः परम घोरे घोर स्वरुपे एहि एहि नमश्चामुण्डे डरलकसहै श्री दक्षिण-कालिके देवि वरदे विद्ये ! इस मन्त्र का शिर में द्वादश बार जप करें । इसके बाद ‘महाकुण्डलिनी’ का ध्यान कर इष्टमंत्र का जप करना चाहिए । मंत्र सिद्धि के लिये मंत्र के दश संस्कार भी आवश्यक हैं ।
जननं जीवनं पश्चात् ताडनं बोधनं तथा ।
अथाभिषेको विमलीकरणाप्यायनं पुनः ।
तर्पणं दीपनं गुप्तिर्दशैताः मंत्र संस्क्रियाः ।।
 

 

मन्त्रः-
“ॐ गों गोरक्षनाथ महासिद्धः, सर्व-व्याधि विनाशकः ।
विस्फोटकं भयं प्राप्ते, रक्ष रक्ष महाबल ।। १।।
यत्र त्वं तिष्ठते देव, लिखितोऽक्षर पंक्तिभिः ।
रोगास्तत्र प्रणश्यन्ति, वातपित्त कफोद्भवाः ।। २।।
तत्र राजभयं नास्ति, यान्ति कर्णे जपाः क्षयम् ।
शाकिनी भूत वैताला, राक्षसा प्रभवन्ति न ।। ३।।
नाऽकाले मरणं तस्य, न च सर्पेण दश्यते ।
अग्नि चौर भयं नास्ति, ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं गों ।। ४।।
ॐ घण्टाकर्णो नमोऽस्तु ते ॐ ठः ठः ठः स्वाहा ।।”
 
 
 
विधिः- यह मंत्र तैंतीस हजार या छत्तीस हजार जाप कर सिद्ध करें । इस मंत्र के प्रयोग के लिए इच्छुक उपासकों को पहले गुरु-पुष्य, रवि-पुष्य, अमृत-सिद्धि-योग, सर्वार्त-सिद्धि-योग या दिपावली की रात्रि से आरम्भ कर तैंतीस या छत्तीस हजार का अनुष्ठान करें । बाद में कार्य साधना के लिये प्रयोग में लाने से ही पूर्णफल की प्राप्ति होना सुलभ होता है ।
विभिन्न प्रयोगः- इस को सिद्ध करने पर केवल इक्कीस बार जपने से राज्य भय, अग्नि भय, सर्प, चोर आदि का भय दूर हो जाता है । भूत-प्रेत बाधा शान्त होती है । मोर-पंख से झाड़ा देने पर वात, पित्त, कफ-सम्बन्धी व्याधियों का उपचार होता है ।
१॰ मकान, गोदाम, दुकान घर में भूत आदि का उपद्रव हो तो दस हजार जप तथा दस हजार गुग्गुल की गोलियों से हवन किया जाये, तो भूत-प्रेत का भय मिट जाता है । राक्षस उपद्रव हो, तो ग्यारह हजार जप व गुग्गुल से हवन करें ।
२॰ अष्टगन्ध से मंत्र को लिखकर गेरुआ रंग के नौ तंतुओं का डोरा बनाकर नवमी के दिन नौ गांठ लगाकर इक्कीस बार मंत्रित कर हाथ के बाँधने से चौरासी प्रकार के वायु उपद्रव नष्ट हो जाते हैं ।
३॰ इस मंत्र का प्रतिदिन १०८ बार जप करने से चोर, बैरी व सारे उपद्रव नाश हो जाते हैं तथा अकाल मृत्यु नहीं होती तथा उपासक पूर्णायु को प्राप्त होता है ।
४॰ आग लगने पर इक्कीस बार पानी को अभिमंत्रित कर छींटने से आग शान्त होती है ।
५॰ मोर-पंख से इस मंत्र द्वारा झाड़े तो शारीरिक नाड़ी रोग व श्वेत कोढ़ दूर हो जाता है ।
६॰ कुंवारी कन्या के हाथ से कता सूत के सात तंतु लेकर इक्कीस बार अभिमंत्रित करके धूप देकर गले या हाथ में बाँधने पर ज्वर, एकान्तरा, तिजारी आदि चले जाते हैं ।
७॰ सात बार जल अभिमंत्रित कर पिलाने से पेट की पीड़ा शान्त होती है ।
८॰ पशुओं के रोग हो जाने पर मंत्र को कान में पढ़ने पर या अभिमंत्रित जल पिलाने से रोग दूर हो जाता है । यदि घंटी अभिमंत्रित कर पशु के गले में बाँध दी जाए, तो प्राणि उस घंटी की नाद सुनता है तथा निरोग रहता है ।
९॰ गर्भ पीड़ा के समय जल अभिमंत्रित कर गर्भवती को पिलावे, तो पीड़ा दूर होकर बच्चा आराम से होता है, मंत्र से १०८ बार मंत्रित करे ।
१०॰ सर्प का उपद्रव मकान आदि में हो, तो पानी को १०८ बार मंत्रित कर मकानादि में छिड़कने से भय दूर होता है । सर्प काटने पर जल को ३१ बार मंत्रित कर पिलावे तो विष दूर हो ।
 

 

विनियोगः- ॐ अस्य श्रीगर्भचण्डीमाला मन्त्रस्य श्रीब्रह्मा विष्णु महेश्वरादि ऋषयः । गायत्र्युष्णिगनुष्टुप् छंदांसि । श्रीशक्तिस्वरुपिणी महाचण्डी देवता । ऐं बीजं । ह्रीं कीलकं । क्लीं शक्तीः । मम चतुर्विध पुरुषार्थ सिद्धयर्थे जपे विनियोगः ।
ऋष्यादिन्यासः- ॐ अस्य श्रीगर्भचण्डीमाला मन्त्रस्य श्रीब्रह्मा विष्णु महेश्वरादि ऋषिभ्यो नमः शिरसि । गायत्र्युष्णिगनुष्टुप् छंदोभ्यो नमः मुखे । श्रीशक्तिस्वरुपिणी महाचण्डी देवतायै नमः हृदि । ऐं बीजाय नमः गुह्ये । ह्रीं कीलकाय नमः नाभौ । क्लीं शक्तये नमः पादयो । मम चतुर्विध पुरुषार्थ सिद्धयर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे ।
 
षडङ्ग-न्यास कर-न्यास अंग-न्यास
ॐ ह्रां अंगुष्ठाभ्यां नमः हृदयाय नमः
ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः शिरसे स्वाहा
ॐ ह्रूं मध्यमाभ्यां नमः शिखायै वषट्
ॐ ह्रैं अनामिकाभ्यां नमः कवचाय हुं
ॐ ह्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः नेत्र-त्रयाय वौषट्
ॐ ह्रः करतल-कर-पृष्ठाभ्यां नमः अस्त्राय फट्
।।ध्यानम्।।
शुद्ध स्फटिक संकाशां रवि विम्बाननां शिवाम् ।
अनेक शक्तिसंयुक्तां सिंहपृष्ठे निषेदुषीम् ।।
अंकुशं चाक्षसूत्रं च पाशपुस्तक धारिणीम् ।
मुक्ताहार समायुक्तां चण्डीं ध्याये चतुर्भुजाम् ।।
सितेन दर्पणाब्जेन वस्त्रालंकार भूषितम् ।
जटाकलाप संयुक्तां सुस्तनीं चन्द्रशेखराम् ।।
कटकैः स्वर्ण रत्नाढ्यैर्महावलय शोभिताम् ।
कम्बुकण्ठीं सु ताम्रोष्ठीं सर्पनूपुरधारिणीम् ।।
केयुर मेखलाद्यैश्च द्योतयंतीं जगत्-त्रयम् ।
एवं ध्याये महाचण्डीं सर्वकामार्थ सिद्धिदाम् ।।
चतुष्टय-मुद्रा का प्रदर्शन करना चाहियेः- १॰ पाश, २॰ अंकुश, ३॰ अक्षसूत्र तथा ४॰ पुस्तक ।
।। अथ पाठः ।।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः ब्रह्मोवाच मः न क्लीं ह्रीं ऐं ॐ ।। १ ।।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः यच्च किञ्चित् क्वचिद् अस्तु सदसद् वाखिलात्मिके ।
तस्य सर्वस्य या शक्तिः सा त्वं किं स्तूयसे तदा । मः न क्लीं ह्रीं ऐं ॐ ।। २ ।।
ॐ श्रीं नमः सम्मानिता ननादौच्चैः साट्टहासं मुहुर्मुहुः ।
तस्या नादेन घोरेण कृत्स्नमापूरितं नमः । मः न श्रीं ॐ ।। ३ ।।
ॐ श्रीं नमः अर्द्धनिष्क्रान्तः एवासौ युध्यमानो महाऽसुरः ।
तया महाऽसिना देव्या शिरश्छित्वा निपातितः । मः न श्रीं ॐ ।। ४ ।।
ॐ श्रीं नमः दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेष जन्तोः
स्वस्थै स्मृता मतिवमतीव शुभां ददासि ।
दारिद्रय दुःख भय हारिणि का त्वदन्या
सर्वोपकार करणाय सदाऽऽर्द्रचित्ता । मः न श्रीं ॐ ।। ५ ।।
ॐ क्लीं नमः इन्द्रियाणामधिष्ठात्री भूतानां चाखिलेषु या ।
भूतेषु सततं तस्यै व्याप्तिदेव्यै नमो नमः । मः न क्लीं ॐ ।। ६ ।।
ॐ क्लीं नमः इत्युक्तः सोऽभ्यधावत् तामसुरो धूम्रलोचनः ।
हुंकारेणैव तं भस्म सा चकाराम्बिका ततः । मः न क्लीं ॐ ।। ७ ।।
ॐ क्लीं नमः भृकुटी कुटिलात् तस्याः ललाटफलकाद् द्रुतम् ।
काली कराल वदना विनिष्क्रान्ताऽसि पाशिनी । मः न क्लीं ॐ ।। ८ ।।
ॐ क्लीं नमः ब्रह्रेश गुहविष्णुनां तथेन्द्रस्य च शक्तयः ।
शरीरेभ्यो विनिष्क्रमय तद्रुपैश्चण्डिकां ययुः मः न क्लीं ॐ ।। ९ ।।
ॐ क्लीं नमः अट्टाट्टहासमशिवं शिवदूती चकार ह ।
तैः शब्दैरसुरास्त्रेसुः शम्भुः कोपं परं ययौ । मः न क्लीं ॐ ।। १० ।।
ॐ क्लीं नमः एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा ?
पश्यैता दुष्ट मय्येव विशन्त्यो मद्विभूतयः । मः न क्लीं ॐ ।। ११ ।।
ॐ क्लीं नमः सर्वस्वरुपे सर्वेशे सर्व-शक्ति-समन्विते ।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोस्तुऽते । मः न क्लीं ॐ ।। १२ ।।
ॐ क्लीं नमः देव्युवाच मः न क्लीं ॐ ।। १३ ।।
ॐ क्लीं नमः सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो धन-धान्य सुतान्वितः ।
मनुष्यो मत्-प्रसादेन भविष्यति न संशयः । मः न क्लीं ॐ ।। १४ ।।
ॐ क्लीं नमः यत् प्रार्थ्यते त्वया भूप त्वया च कुलनन्दन ।
मत्तस्तत् प्राप्यतां सर्वं परितुष्टा ददामि तत् । मः न क्लीं ॐ ।। १५ ।।
।। जय जय श्रीमार्कण्डेय पुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवी महात्म्ये सत्याः सन्तु मनसः कामाः ।।
 

 

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः ब्रह्मोवाच मः न क्लीं ह्रीं ऐं ॐ ।। १ ।।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं हि वषट्कारः स्वरात्मिका ।
सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिताः ।। मः न क्लीं ह्रीं ऐं ॐ ।। २ ।।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः अर्द्धमात्रास्थिता नित्या यानुर्च्चायां विशेषतः ।
त्वमेव सन्ध्या सावित्री त्वं देवि जननी परा ।। मः न क्लीं ह्रीं ऐं ॐ ।। ३ ।
 

 

मूलमन्त्र से विन्यास, ध्यान व मानसोपचार से पूजन करें ।
 
मूल मन्त्र – “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे क्लीं ह्रीं ऐं ॐ नमः स्वाहा” का यथाशक्ति जाप करें समर्पण पश्चात् उत्कीलन करें यथा -
“ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं चण्डि सकलमन्त्राणां शापविमोचनं कुरु-कुरु स्वाहा ।”
तीन बार जपें
“ॐ श्री ह्रीं क्लीं चण्डि सप्तशतिके सर्वमन्त्राणां उत्कीलनं कुरु-कुरु स्वाहा ।” (तीन बार जपें)
 

 

वशीकरण का मन्त्र
 
मन्त्रः-
“जन मन मंजु मुकुर मल हरनी ।
 
कियें तिलक गुन गन बस करनी ।।”
 
मन्त्र की प्रयोग विधि और लाभः-
किसी ग्रहण काल के पूर्ण समय में इस मन्त्र के लगातार जप करते रहें और जब आवश्यकता हो तब गोरोचन को घिस करके इस मन्त्र से सात बार शक्तिकृत करके माथे में टीका लगा लें ।
स्त्री अपने पति को वशीभूत करने के लिये छुहारे की गुठली को घिसकर यह मन्त्र पढ़ते हुए प्रातःकाल के समय माथे में बिंदी लगा कर सोते हुए पति को हंसते हुए जगाये । इस मन्त्र के प्रयोग से वशीकरण होता है ।
 

 

मन्त्रः-
“भव भेषज रघुनाथ जसु,
सुनहिं जे नर अरु नारि ।
 
तिन्ह कर सकल मनोरथ,
सिद्ध करहिं त्रिसरारि ।।”
 
मन्त्र की प्रयोग विधि और लाभः-
कामना के अनुसार माला लेकर उससे इस मन्त्र के ५०० जप नित्य करते हुए ३१ दिन तक करें । जब आवश्यकता हो तब पान या इलायची को इस मन्त्र से शक्तिकृत करके उस व्यक्ति को खीलायें, जिससे कार्य करवाना हो ।
इस मन्त्र के प्रयोग से सकल मनोरथ सिद्ध होते हैं ।
 

 

श्री गुरु गोरखनाथ का शाबर मंत्र 
 
 
विधि - सात कुओ या किसी नदी से सात बार जल लाकर इस मंत्र का उच्चारण करते हुए रोगी को स्नान करवाए तो उसके ऊपर से सभी प्रकार का किया-कराया उतर जाता है. 
 
मंत्र 
 
ॐ वज्र में कोठा, वज्र में ताला, वज्र में बंध्या दस्ते द्वारा, तहां वज्र का लग्या किवाड़ा, वज्र में चौखट, वज्र में कील, जहां से आय, तहां ही जावे, जाने भेजा, जांकू खाए, हमको फेर न सूरत दिखाए, हाथ कूँ, नाक कूँ, सिर कूँ, पीठ कूँ, कमर कूँ, छाती कूँ जो जोखो पहुंचाए, तो गुरु गोरखनाथ की आज्ञा फुरे, मेरी भक्ति गुरु की शक्ति, फुरो मंत्र इश्वरोवाचा. 
 

 

महिषासुरमर्दिनि   स्तोत्रम् :   अयि   गिरिनन्दिनि   नन्दितमेदिनि
 
 
 
अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते
गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।
भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १ ॥
 
 
 
सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते
त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते
दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २ ॥
 
 
 
 
 
अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब वनप्रियवासिनि हासरते
शिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमलय शृङ्गनिजालय मध्यगते ।
मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ३ ॥
 
 
 
अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्द गजाधिपते
रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते ।
निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ४ ॥
 
 
 
अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते
चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते ।
दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदुत कृतान्तमते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ५ ॥
 
 
 
अयि शरणागत वैरिवधुवर वीरवराभय दायकरे
त्रिभुवनमस्तक शुलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शुलकरे ।
दुमिदुमितामर धुन्दुभिनादमहोमुखरीकृत दिङ्मकरे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ६ ॥
 
 
 
अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते
समरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते ।
शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ७ ॥
 
 
 
धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके
कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके ।
कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ८ ॥
 
 
 
जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुति तत्परविश्वनुते
झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते ।
नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ९ ॥
 
 
 
अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुते
श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते ।
सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १० ॥
 
 
 
सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरते
विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते ।
शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ११ ॥
 
 
 
अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्ग जराजपते
त्रिभुवनभुषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते ।
अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १२ ॥
 
 
 
कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललते
सकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले ।
अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १३ ॥
 
 
 
करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमते
मिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते ।
निजगणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १४ ॥
 
 
 
कटितटपीत दुकूलविचित्र मयुखतिरस्कृत चन्द्ररुचे
प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे
जितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १५ ॥
 
 
 
विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते
कृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते ।
सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १६ ॥
 
 
 
पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे
अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् ।
तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १७ ॥
 
 
 
कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुषिञ्चति तेगुणरङ्गभुवम्
भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम् ।
तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम्
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १८ ॥
 
 
 
तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते
किमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते ।
मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १९ ॥
 
 
 
अयि मयि दीन दयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे
अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते ।
यदुचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २० ॥
 

 

ॐ   तत्पुरुषाय   विद्महे
वक्रतुंडाय   धीमहि   ।
तन्नो   दंती   प्रचोदयात  ॥
 

 

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥
 

 

ॐ   गुरुदेवाय   विद्महे
परब्रह्माय   धीमहि   ।
तन्नो   गुरुः   प्रचोदयात  ॥
 

 

अग्रत: चतुरो वेदा: पृष्‍ठत: सशरं धनु: ।
इदं ब्राह्मं इदं क्षात्रं शापादपि शरादपि ।।
 

 

लोक कल्याण-कारक शाबर मन्त्र
 
१॰ अरिष्ट-शान्ति अथवा अरिष्ट-नाशक मन्त्रः-
क॰ “ह्रीं हीं ह्रीं”
ख॰ “ह्रीं हों ह्रीं”
ग॰ “ॐ ह्रीं फ्रीं ख्रीं”
घ॰ “ॐ ह्रीं थ्रीं फ्रीं ह्रीं”
विधिः-उक्त मन्त्रों में से किसी भी एक मन्त्र को सिद्ध करें । ४० दिन तक प्रतिदिन १ माला जप करने से मन्त्र सिद्ध होता है । बाद में संकट के समय मन्त्र का जप करने से सभी संकट समाप्त हो जाते हैं ।
 
२॰ सर्व-शुभ-दायक मन्त्रः-
मन्त्र - ” ॐ ख्रीं छ्रीं ह्रीं थ्रीं फ्रीं ह्रीं ।”
विधिः- उक्त मन्त्र का सदैव स्मरण करने से सभी प्रकार के अरिष्ट दूर होते हैं । अपने हाथ में रक्त पुष्प (कनेर या गुलाब) लेकर उक्त मन्त्र का १०८ बार जप कर अपनी इष्ट-देवी पर चढ़ाए अथवा अखण्ड भोज-पत्र पर उक्त मन्त्र को दाड़िम की कलम से चन्दन-केसर से लिखें और शुभ-योग में उसकी पञ्चोपचारों से पूजा करें ।
 
३॰ अशान्ति-निवारक-मन्त्रः-
मन्त्रः- “ॐ क्षौं क्षौं ।”
विधिः- उक्त मन्त्र के सतत जप से शान्ति मिलती है । कुटुम्ब का प्रमुख व्यक्ति करे, तो पूरे कुटुम्ब को शान्ति मिलती है ।
 
४॰ शान्ति, सुख-प्राप्ति-मन्त्रः-
मन्त्रः- “ॐ ह्रीं सः हीं ठं ठं ठं ।”
विधिः- शुभ योग में उक्त मन्त्र का १२५ माला जप करे । इससे मन्त्र-सिद्धि होगी । बाद में दूध से १०८ अहुतियाँ दें, तो शान्ति, सुख, बल-बुद्धि की प्राप्ति होती है ।
 
५॰ रोग-शान्ति-मन्त्रः-
मन्त्रः- “ॐ क्षीं क्षीं क्षीं क्षीं क्षीं फट् ।”
विधिः- उक्त मन्त्र का ५०० बार जप करने से रोग-निवारण होता है । प्रतिदिन जप करने से सु-स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है । कुटुम्ब में रोग की समस्या हो, तो कुटुम्ब का प्रधान व्यक्ति उक्त मन्त्र से अभिमन्त्रित जल को रोगी के रहने के स्थान में छिड़के । इससे रोग की शान्ति होगी । जब तक रोग की शान्ति न हो, तब तक प्रयोग करता रहे ।
 
६॰ सर्व-उपद्रव-शान्ति-मन्त्रः-
मन्त्रः- “ॐ घण्टा-कारिणी महा-वीरी सर्व-उपद्रव-नाशनं कुरु कुरु स्वाहा ।”
विधिः- पहले इष्ट-देवी को पूर्वाभिमुख होकर धूप-दीप-नैवेद्य अर्पित करें । फिर उक्त मन्त्र का ३५०० बार जप करें । बाद में पश्चिमाभिमुख होकर गुग्गुल से १००० आहुतियाँ दें । ऐसा तीन दिन तक करें । इससे कुटुम्ब में शान्ति होगी ।
 
७॰ ग्रह-बाधा-शान्ति मन्त्रः-
मन्त्रः- “ऐं ह्रीं क्लीं दह दह ।”
विधिः- सोम-प्रदोष से ७ दिन तक, माल-पुआ व कस्तूरी से उक्त मन्त्र से १०८ आहुतियाँ दें । इससे सभी प्रकार की ग्रह-बाधाएँ नष्ट होती हैं ।
 
८॰ देव-बाधा-शान्ति-मन्त्रः-
मन्त्रः- “ॐ सर्वेश्वराय हुम् ।”
विधिः- सोमवार से प्रारम्भ कर नौ दिन तक उक्त मन्त्र का ३ माला जप करें । बाद में घृत और काले-तिल से आहुति दें । इससे दैवी-बाधाएँ दूर होती हैं और सुख-शान्ति की प्राप्ति होती है ।
 

 

अनुभूति करने का मन्त्र
 
मन्त्रः-
“मोरे हित हरि सम नहिं कोऊ ।
एहि अवसर सहाय सोइ होऊ ।।”
 
मन्त्र की प्रयोग विधि और लाभः-
प्रभु कृपा के लिए एकाग्रता आवश्यक है अतः तन-मन को प्रभु राम में जोड़ करके इस मन्त्र के लगातार जप करते रहें । जप काल में जैसी अनुभूति हो वैसा ही करके लाभ उठायें ।
 
जब कोई भी उपाय लाभान्वित न कर रहा हो और प्राण या मान संकट में हो तब इस मन्त्र का प्रयोग करते हैं ।
 

 

वशीकरण का अनूठा प्रयोग
 
मन्त्रः-
“जति हनुमन्ता, जाय मरघट । पिण्ड का कोन है शोर, छत्तीमय बन पड़े । जेही दश मोहुँ, तेही दश मोहुँ । गुरु की शक्ति, मेरी भक्ति । फुरो मन्त्र, ईश्वरो वाचा ।”
 
 
विधिः- शनिवार के दिन हनुमान जी का विधि-वत् पूजन करें । ‘सुखडी’ का नैवेद्य चढ़ाएं । ‘सुखड़ी’ गेहूँ के आटे, गुड़ व घृत से बनती है । नैवेद्य अर्पित कर उक्त मन्त्र का १५०० ‘जप’ करें । ८ दिनों तक या शनिवार तक जप करें । इससे मन्त्र की सिद्धि होगी । फिर नित्य निश्चित संख्या में ‘जप’ करता रहे । इससे मन्त्र चैतन्य रहेगा ।
बाद में जब आवश्यकता हो, तो चौराहे की मिट्टी ७ चुटकी या ७ कंकड़ लाएं और घर में ही रखकर प्रत्येक के ऊपर २५०-२५० बार उक्त मन्त्र जप कर अभिमन्त्रित करें । फिर मिट्टी या कंकड़ी को ऐसे जलाशय में या कुएँ में या तालाब में डाले, जहाँ से पूरे गाँव को या मुहल्ले को जल वितरित होता हो । जल का पान करने वाले लोगों का वशीकरण होगा ।
इस प्रकार के प्रयोग छोटे गाँव के ऊपर करने से ही ठीक परिणाम मिलता है । इसके अतिरिक्त साधक-बन्धु अन्य परिवर्तन स्व-सूझ-बूझ से कर सकते हैं ।
 

 

ढैया व साढ़ेसाती में लाभ : शनि स्त्रोत, शनि मंत्र, शनि वज्रपिंजर कवच तथा महाकाल शनि मृत्युंजय स्त्रोत का पाठ करने से जिन जातकों को शनि की साढ़ेसाती व ढैया चल रहा है, उन्हें मानसिक शांति, कवच की प्राप्ति तथा सुरक्षा के साथ भाग्य उन्नति का लाभ होता है। सामान्य जातक जिन्हें ढैया अथवा साढ़ेसाती नहीं है, वे शनि कृपा प्राप्ति के लिए अपंग आश्रम में भोजन तथा चिकित्सालय में रुग्णों को ब्रेड व बिस्किट बांट सकते हैं।
 
* महामृत्युंजय मंत्र का सवा लाख जप (नित्य 10 माला, 125 दिन) करें-
 
- ॐ त्र्यम्बकम्* यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्द्धनं उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्*।
 
* शनि के निम्न मंत्र का 21 दिन में 23 हजार जप करें -
- ॐ शन्नोदेवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये।
शंयोरभिश्रवन्तु नः। ऊँ शं शनैश्चराय नमः।
 
* पौराणिक शनि मंत्र :
- ऊँ नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्*।
छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्*।
 
* टोटका - शनिवार के दिन उड़द, तिल, तेल, गु़ड का लड्डू बना लें और जहां हल न चला हो वहां गाड़ दें।
 

 

“गरल सुधा रिपु करहिं मिताई ।
गोपद सिन्धु अनल सितलाई ।।”
 
मन्त्र की प्रयोग विधि और लाभः-
नवरात्रि के पवित्र समय पर इस मन्त्र को १००० बार प्रतिदिन जपें । जब आवश्यकता हो इस मन्त्र से शक्तिकृत करके गोरोचन का टीका लगा लें । किसी भी कार्य से शत्रु के समक्ष जायें, तो वह मित्रवत् बन जाता है ।
 

 

शत्रु परास्त करने का मन्त्र
 
मन्त्रः-
“कर सारंग साजि कटि भाथा ।
अरि दल दलन चले रघुनाथा ।।”
 
मन्त्र की प्रयोग विधि और लाभः-
कहीं पर प्रभु श्री राम की प्रतिमा देखकर इस अनुष्ठान का शुभारम्भ करें ।
एक कमलगट्टा लेकर प्रतिमा के पास जाएं और उनके पाँव में इसे रखकर इस मन्त्र के १००० पाठ करें । पाठ के पश्चात् कमलगट्टा उठा लाएं और कहीं छुपा लें । दूसरे दिन दूसरा कमलगट्टा लेकर पुनः उपरोक्त क्रिया करें और उसी कमलगट्टे के साथ इस कमलगट्टे को रखकर छुपा लें । इसी भाँति ४० दिन करना होगा ।
इस अनुष्ठान की समाप्ति पर आपके पास ४० कमलगट्टे एकत्र हो जाएँगे । इन्हें एकान्त में पीस लें और चूर्ण बना लें । इस चूर्ण में अपनी कनिष्ठा का रक्त, चमेली की जड़ का अर्क मिलाकर पुनः एक बटिका बनाकर केले के पत्ते की छाया में सुखा लें । सुखाने के पहले इसमें आरपार एक छिद्र कर लें ।
जब यह बटिका सूख जाए तो काले सूत के धागे में डाल कर कण्ठ में धारण कर लें । उक्त मन्त्र को जपकर शत्रु के समक्ष जाएं । इस प्रकार से शत्रु को परास्त किया जाता है ।
 

 

शरीर स्वस्थ रखने का मन्त्र
 
मन्त्रः-
“त्रिविध दोष दुःख दारिद दावन ।
कलि कुचालि कुलि कलुष नसावन ।।”
 
 
मन्त्र की प्रयोग विधि और लाभः-
सर्वप्रथम शिवरात्रि के अवसर पर इसे एक लाख बार जप लें । इसके बाद जब भी आवश्यकता हो काँसे की कटोरी में जल भर करके इस मन्त्र से १०८ बार फूँक मारकर रोगी को पिला दें ।
इस मन्त्र के प्रयोग से देह को स्वस्थ किया जाता है ।
 

 

संकट में रक्षा का उपाय मन्त्र
 
मन्त्रः-
“पाहि पाहि रघुबीर गोसाईं ।
यह खल खाई काल की नाईं ।।”
 
मन्त्र की प्रयोग विधि और लाभः-
रुद्राक्ष की माला पर पूर्वाभिमुख होकर इस मन्त्र के १००० जप करें ।
इस मन्त्र के प्रयोग से संकट में रक्षा होती है ।
 

 

ज्वर उतारने का मन्त्र
 
मन्त्रः-
“सुनु खगपति यह कथा पावनी ।
त्रिविध ताप भव भय दावनी ।।”
 
 
 
मन्त्र की प्रयोग विधि और लाभः-
सर्वप्रथम शिवरात्रि के अवसर पर इसे एक लाख बार जप लें । इसके बाद जब भी आवश्यकता हो काँसे की कटोरी में जल भर करके इस मन्त्र से १०८ बार फूँक मारकर रोगी को पिला दें ।
इस मन्त्र के प्रयोग से तीन तरह के ज्वर और तिजारी ज्वर तो विशेष ही ठीक हो जाते हैं ।
 

 

भक्ति भावना बढ़ाने का मन्त्र
 
मन्त्रः-
“सीताराम चरन रति मोरे ।
अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरे ।।”
 
मन्त्र की प्रयोग विधि और लाभः-
इस मन्त्र को प्रतिदिन निद्रा त्यागते ही १०८ बार पढ़ना चाहिए ।
इस मन्त्र के प्रयोग से श्रीराम-जानकी के प्रति भक्ति भावना सुदृढ़ होती है ।
 

 

सामाजिक यश (सुख) का मन्त्र
 
मन्त्रः-
“सुनि समुझहिं जन मुदित,
मन मज्जहिं अति अनुराग ।
लहहीं चारि फल अछथ,
तनु साधु समाज प्रयाग ।।”
 
मन्त्र की प्रयोग विधि और लाभः-
प्रतिदिन स्फटिक की माला पर १००० मन्त्रों का जप करें । इस क्रिया को ९० दिन तक करें और ९१वें दिन कोढ़ियों को खिचड़ी खिलायें ।
इस मन्त्र के प्रयोग से देह का सुख, साधुओं की कृपा, समाज का सहयोग तथा प्रयाग स्नान का फल प्राप्त होता है ।
 

 

MANTRAH-
“AJARANG PAHANOON, BAJARANG PAHANOON, SABARANG RAKKHOO PAS . DANYE CHALE BHIM SEN, BANYE HANUMANT, AAGE CHALE KAJI SAHAB, PICHHE KUL BALARAD . AATAR CHAUKEE KACHCHH KURAN . AAGE PICHHE TOON RAHAMAN . DHAD KHUDA, SIR RAKHE . SULEMAN, LOHE KA KOT, TANBE KA TALA, KARALA . HANSA BIRA . KARATAL BASE SAMUDR TIR HANK CHALE HANUMAN KEE NIRMAL RAHE SHARIR .”
( SHABAR MANTRA )
 
VIDHI- IS MANTRA KA ANUSHTHAN 21 DIN KA HAI, KISI BHI MANGALAVAR KEE RATRAEE KO HANUMAN JI VISHAYAK SABHI NIYAM MANATE HUE, SADHAK PRATIDIN 11 MALA JAP KAREN TO HANUMAN JI PRATYAKSHA YA APRATYAKSHA KISI BHI RUP MEN DARSHAN DEKAR USAKEE SAMAST ABHILASHAEN POORI KARATE HAIN .
 

 

श्री हनुमान अष्टादशाक्षर मन्त्र-प्रयोग
मन्त्रः- “ॐ नमो हनुमते आवेशय आवेशय स्वाहा ।”
विधिः- सबसे पहले हनुमान जी की एक मूर्त्ति रक्त-चन्दन से बनवाए । किसी शुभ मुहूर्त्त में उस मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा कर उसे रक्त-वस्त्रों से सु-शोभित करे । फिर रात्रि में स्वयं रक्त-वस्त्र धारण कर, रक्त आसन पर पूर्व की तरफ मुँह करके बैठे । हनुमान जी उक्त मूर्त्ति का पञ्चोपचार से पूजन करे । किसी नवीन पात्र में गुड़ के चूरे का नैवेद्य लगाए और नैवेद्य को मूर्ति के सम्मुख रखा रहने दे । घृत का ‘दीपक’ जलाकर, रुद्राक्ष की माला से उक्त ‘मन्त्र’ का नित्य ११०० जप करे और जप के बाद स्वयं भोजन कर, ‘जप’-स्थान पर रक्त-वस्त्र के बिछावन पर सो जाए ।
अगली रात्रि में जब पुनः पूजन कर नैवेद्य लगाए, तब पहले दिन के नैवेद्य को दूसरे पात्र में रख लें । इस प्रकार ११ दिन करे ।
१२वें दिन एकत्र हुआ ‘नैवेद्य’ किसी दुर्बल ब्राह्मण को दे दें अथवा पृथ्वी में गाड़ दे । ऐसा करने से हनुमान जी रात्रि में स्वप्न में दर्शन देकर सभी प्रकार की समस्याओं का समाधान कर सेते हैं । ‘प्रयोग’ को गुप्त-भाव से करना चाहिए ।
 

"OM JUM SAM MAM PALAYAE SAM JUME OM"

 

 

।। ब्रह्मास्त्र माला मंत्र ।।
 
ॐ नमो भगवति चामुण्डे नरकंकगृधोलूक परिवार सहिते श्मशानप्रिये नररूधिर मांस चरू भोजन प्रिये सिद्ध विद्याधर वृन्द वन्दित चरणे ब्रह्मेश विष्णु वरूण कुबेर भैरवी भैरवप्रिये इन्द्रक्रोध विनिर्गत शरीरे द्वादशादित्य चण्डप्रभे अस्थि मुण्ड कपाल मालाभरणे शीघ्रं दक्षिण दिशि आगच्छागच्छ मानय-मानय नुद-नुद अमुकं (अपने शत्रु का नाम लें) मारय-मारय, चूर्णय-चूर्णय, आवेशयावेशय त्रुट-त्रुट, त्रोटय-त्रोटय स्फुट-स्फुट स्फोटय-स्फोटय महाभूतान जृम्भय-जृम्भय ब्रह्मराक्षसान-उच्चाटयोच्चाटय भूत प्रेत पिशाचान् मूर्च्छय-मूर्च्छय मम शत्रून् उच्चाटयोच्चाटय शत्रून् चूर्णय-चूर्णय सत्यं कथय-कथय वृक्षेभ्यः सन्नाशय-सन्नाशय अर्कं स्तम्भय-स्तम्भय गरूड़ पक्षपातेन विषं निर्विषं कुरू-कुरू लीलांगालय वृक्षेभ्यः परिपातय-परिपातय शैलकाननमहीं मर्दय-मर्दय मुखं उत्पाटयोत्पाटय पात्रं पूरय-पूरय भूत भविष्यं तय्सर्वं कथय-कथय कृन्त-कृन्त दह-दह पच-पच मथ-मथ प्रमथ-प्रमथ घर्घर-घर्घर ग्रासय-ग्रासय विद्रावय – विद्रावय उच्चाटयोच्चाटय विष्णु चक्रेण वरूण पाशेन इन्द्रवज्रेण ज्वरं नाशय – नाशय प्रविदं स्फोटय-स्फोटय सर्व शत्रुन् मम वशं कुरू-कुरू पातालं पृत्यंतरिक्षं आकाशग्रहं आनयानय करालि विकरालि महाकालि रूद्रशक्ते पूर्व दिशं निरोधय-निरोधय पश्चिम दिशं स्तम्भय-स्तम्भय दक्षिण दिशं निधय-निधय उत्तर दिशं बन्धय-बन्धय ह्रां ह्रीं ॐ बंधय-बंधय ज्वालामालिनी स्तम्भिनी मोहिनी मुकुट विचित्र कुण्डल नागादि वासुकी कृतहार भूषणे मेखला चन्द्रार्कहास प्रभंजने विद्युत्स्फुरित सकाश साट्टहासे निलय-निलय हुं फट्-फट् विजृम्भित शरीरे सप्तद्वीपकृते ब्रह्माण्ड विस्तारित स्तनयुगले असिमुसल परशुतोमरक्षुरिपाशहलेषु वीरान शमय-शमय सहस्रबाहु परापरादि शक्ति विष्णु शरीरे शंकर हृदयेश्वरी बगलामुखी सर्व दुष्टान् विनाशय-विनाशय हुं फट् स्वाहा। ॐ ह्ल्रीं बगलामुखि ये केचनापकारिणः सन्ति तेषां वाचं मुखं पदं स्तम्भय-स्तम्भय जिह्वां कीलय – कीलय बुद्धिं विनाशय-विनाशय ह्रीं ॐ स्वाहा । ॐ ह्रीं ह्रीं हिली-हिली अमुकस्य (शत्रु का नाम लें) वाचं मुखं पदं स्तम्भय शत्रुं जिह्वां कीलय शत्रुणां दृष्टि मुष्टि गति मति दंत तालु जिह्वां बंधय-बंधय मारय-मारय शोषय-शोषय हुं फट् स्वाहा।।
 

 

यह स्तोत्र शत्रुनाश एवं कृत्यानाश, परविद्या छेदन करने वाला एवं रक्षा कार्य हेतु प्रभावी है । साधारण साधकों को कुछ समय आवेश व आर्थिक दबाव रहता है, अतः पूजा उपरान्त नमस्तस्यादि शांति स्तोत्र पढ़ने चाहिये ।
विनियोगः- ॐ अस्य श्रीपीताम्बरा बगलामुखी खड्गमाला मन्त्रस्य नारायण ऋषिः, त्रिष्टुप् छन्दः, बगलामुखी देवता, ह्लीं बीजं, स्वाहा शक्तिः, ॐ कीलकं, ममाभीष्टसिद्धयर्थे सर्वशत्रु-क्षयार्थे जपे विनियोगः ।
हृदयादि-न्यासः-नारायण ऋषये नमः शिरसि, त्रिष्टुप् छन्दसे नमः मुखे, बगलामुखी देवतायै नमः हृदि, ह्लीं बीजाय नमः गुह्ये, स्वाहा शक्तये नमः पादयो, ॐ कीलकाय नमः नाभौ, ममाभीष्टसिद्धयर्थे सर्वशत्रु-क्षयार्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे ।
षडङ्ग-न्यास - कर-न्यास – अंग-न्यास -
ॐ ह्लीं अंगुष्ठाभ्यां नमः हृदयाय नमः
बगलामुखी तर्जनीभ्यां नमः शिरसे स्वाहा
सर्वदुष्टानां मध्यमाभ्यां नमः शिखायै वषट्
वाचं मुखं पद स्तम्भय अनामिकाभ्यां नमः कवचाय हुम्
जिह्वां कीलय कनिष्ठिकाभ्यां नमः नेत्र-त्रयाय वौषट्
बुद्धिं विनाशय ह्लीं ॐ स्वाहा करतल-कर-पृष्ठाभ्यां नमः अस्त्राय फट्
 
ध्यानः-
हाथ में पीले फूल, पीले अक्षत और जल लेकर ‘ध्यान’ करे -
मध्ये सुधाब्धि-मणि-मण्डप-रत्न-वेद्यां, सिंहासनोपरि-गतां परि-पीत-वर्णाम् ।
पीताम्बराभरण-माल्य-विभूषितांगीं, देवीं स्मरामि धृत-मुद्-गर-वैरि-जिह्वाम् ।।
जिह्वाग्रमादाय करेण देवीं, वामेन शत्रून् परि-पीडयन्तीम् ।
गदाभिघातेन च दक्षिणेन, पीताम्बराढ्यां द्विभुजां नमामि ।।
मानस-पूजनः- इस प्रकार ध्यान करके भगवती पीताम्बरा बगलामुखी का मानस पूजन करें -
ॐ लं पृथ्वी-तत्त्वात्मकं गन्धं श्रीबगलामुखी-श्रीपादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि (अधोमुख-कनिष्ठांगुष्ठ-मुद्रा) । ॐ हं आकाश-तत्त्वात्मकं पुष्पं श्रीबगलामुखी-श्रीपादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि (अधोमुख-तर्जनी-अंगुष्ठ-मुद्रा) । ॐ यं वायु-तत्त्वात्मकं धूपं श्रीबगलामुखी-श्रीपादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि (ऊर्ध्व-मुख-तर्जनी-अंगुष्ठ-मुद्रा) । ॐ रं वह्नयात्मकं दीपं श्रीबगलामुखी-श्रीपादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि । (ऊर्ध्व-मुख-मध्यमा-अंगुष्ठ-मुद्रा) । ॐ वं जल-तत्त्वात्मकं नैवेद्यं श्रीबगलामुखी-श्रीपादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि (ऊर्ध्व-मुख-अनामिका-अंगुष्ठ-मुद्रा) । ॐ शं सर्व-तत्त्वात्मकं ताम्बूलं श्रीबगलामुखी-श्रीपादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि (ऊर्ध्व-मुख-सर्वांगुलि-मुद्रा) ।
खड्ग-माला-मन्त्रः-
ॐ ह्लीं सर्वनिन्दकानां सर्वदुष्टानां वाचं मुखं स्तम्भय-स्तम्भय बुद्धिं विनाशय-विनाशय अपरबुद्धिं कुरु-कुरु अपस्मारं कुरु-कुरु आत्मविरोधिनां शिरो ललाट मुख नेत्र कर्ण नासिका दन्तोष्ठ जिह्वा तालु-कण्ठ बाहूदर कुक्षि नाभि पार्श्वद्वय गुह्य गुदाण्ड त्रिक जानुपाद सर्वांगेषु पादादिकेश-पर्यन्तं केशादिपाद-पर्यन्तं स्तम्भय-स्तम्भय मारय-मारय परमन्त्र-परयन्त्र-परतन्त्राणि छेदय-छेदय आत्म-मन्त्र-यन्त्र-तन्त्राणि रक्ष-रक्ष, सर्व-ग्रहान् निवारय-निवारय सर्वम् अविधिं विनाशय-विनाशय दुःखं हन-हन दारिद्रयं निवारय निवारय, सर्व-मन्त्र-स्वरुपिणि सर्व-शल्य-योग-स्वरुपिणि दुष्ट-ग्रह-चण्ड-ग्रह भूतग्रहाऽऽकाशग्रह चौर-ग्रह पाषाण-ग्रह चाण्डाल-ग्रह यक्ष-गन्धर्व-किंनर-ग्रह ब्रह्म-राक्षस-ग्रह भूत-प्रेतपिशाचादीनां शाकिनी डाकिनी ग्रहाणां पूर्वदिशं बन्धय-बन्धय, वाराहि बगलामुखी मां रक्ष-रक्ष दक्षिणदिशं बन्धय-बन्धय, किरातवाराहि मां रक्ष-रक्ष पश्चिमदिशं बन्धय-बन्धय, स्वप्नवाराहि मां रक्ष-रक्ष उत्तरदिशं बन्धय-बन्धय, धूम्रवाराहि मां रक्ष-रक्ष सर्वदिशो बन्धय-बन्धय, कुक्कुटवाराहि मां रक्ष-रक्ष अधरदिशं बन्धय-बन्धय, परमेश्वरि मां रक्ष-रक्ष सर्वरोगान् विनाशय-विनाशय, सर्व-शत्रु-पलायनाय सर्व-शत्रु-कुलं मूलतो नाशय-नाशय, शत्रूणां राज्यवश्यं स्त्रीवश्यं जनवश्यं दह-दह पच-पच सकल-लोक-स्तम्भिनि शत्रून् स्तम्भय-स्तम्भय स्तम्भनमोहनाऽऽकर्षणाय सर्व-रिपूणाम् उच्चाटनं कुरु-कुरु ॐ ह्लीं क्लीं ऐं वाक्-प्रदानाय क्लीं जगत्त्रयवशीकरणाय सौः सर्वमनः क्षोभणाय श्रीं महा-सम्पत्-प्रदानाय ग्लौं सकल-भूमण्डलाधिपत्य-प्रदानाय दां चिरंजीवने । ह्रां ह्रीं ह्रूं क्लां क्लीं क्लूं सौः ॐ ह्लीं बगलामुखि सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्वां कीलय बुद्धिं विनाशय राजस्तम्भिनि क्रों क्रों छ्रीं छ्रीं सर्वजन संमोहिनि सभास्तंभिनि स्त्रां स्त्रीं सर्व-मुख-रञ्जिनि मुखं बन्धय-बन्धय ज्वल-ज्वल हंस-हंस राजहंस प्रतिलोम इहलोक परलोक परद्वार राजद्वार क्लीं क्लूं घ्रीं रुं क्रों क्लीं खाणि खाणि , जिह्वां बन्धयामि सकलजन सर्वेन्द्रियाणि बन्धयामि नागाश्व मृग सर्प विहंगम वृश्चिकादि विषं निर्विषं कुरु-कुरु शैलकानन महीं मर्दय मर्दय शत्रूनोत्पाटयोत्पाटय पात्रं पूरय-पूरय महोग्रभूतजातं बन्धयामि बन्धयामि अतीतानागतं सत्यं कथय-कथय लक्ष्मीं प्रददामि-प्रददामि त्वम् इह आगच्छ आगच्छ अत्रैव निवासं कुरु-कुरु ॐ ह्लीं बगले परमेश्वरि हुं फट् स्वाहा ।
 
विशेषः- मूलमन्त्रवता कुर्याद् विद्यां न दर्शयेत् क्वचित् ।
विपत्तौ स्वप्नकाले च विद्यां स्तम्भिनीं दर्शयेत् ।
गोपनीयं गोपनीयं गोपनीयं प्रयत्नतः ।
प्रकाशनात् सिद्धहानिः स्याद् वश्यं मरणं भवेत् ।
दद्यात् शानताय सत्याय कौलाचारपरायणः ।
दुर्गाभक्ताय शैवाय मृत्युञ्जयरताय च ।
तस्मै दद्याद् इमं खड्गं स शिवो नात्र संशयः ।
अशाक्ताय च नो दद्याद् दीक्षाहीनाय वै तथा ।
न दर्शयेद् इमं खड्गम् इत्याज्ञा शंकरस्य च ।।
।। श्रीविष्णुयामले बगलाखड्गमालामन्त्रः ।।
 

 

देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्ति समूहमूत्र्या।
 
तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नता: स्म विदधातु शुभानि सा न:॥
 
अर्थ :- सम्पूर्ण देवताओं की शक्ति का समुदाय ही जिनका स्वरूप है तथा जिन देवी ने अपनी शक्ति से सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त कर रखा है, समस्त देवताओं और महर्षियों की पूजनीया उन जगदम्बा को हम भक्ति पूर्वक नमस्कार करते हैं। वे हमलोगों का कल्याण करें।
 

 

यस्या: प्रभावमतुलं भगवाननन्तो ब्रह्मा हरश्च न हि वक्तु मलं बलं च।
 
सा चण्डिकाखिलजगत्परिपालनाय नाशाय चाशुभभयस्य मतिं करोतु॥
 
अर्थ :- जिनके अनुपम प्रभाव और बल का वर्णन करने में भगवान् शेषनाग, ब्रह्माजी तथा महादेवजी भी समर्थ नहीं हैं, वे भगवती चण्डिका सम्पूर्ण जगत् का पालन एवं अशुभ भय का नाश करने का विचार करें।
 

 

देवि प्रसीद परिपालय नोऽरिभीतेर्नित्यं यथासुरवधादधुनैव सद्य:।
 
पापानि सर्वजगतां प्रशमं नयाशु उत्पातपाकजनितांश्च महोपसर्गान्॥
 
अर्थ :- देवि! प्रसन्न होओ। जैसे इस समय असुरों का वध करके तुमने शीघ्र ही हमारी रक्षा की है, उसी प्रकार सदा हमें शत्रुओं के भय से बचाओ। सम्पूर्ण जगत् का पाप नष्ट कर दो और उत्पात एवं पापों के फलस्वरूप प्राप्त होनेवाले महामारी आदि बडे-बडे उपद्रवों को शीघ्र दूर करो।
 

 

देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य।
 
प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य॥
 
अर्थ :- शरणागत की पीडा दूर करनेवाली देवि! हमपर प्रसन्न होओ। सम्पूर्ण जगत् की माता! प्रसन्न होओ। विश्वेश्वरि! विश्व की रक्षा करो। देवि! तुम्हीं चराचर जगत् की अधीश्वरी हो।
 

 

विश्वेश्वरि त्वं परिपासि विश्वं विश्वात्मिका धारयसीति विश्वम्। विश्वेशवन्द्या भवती भवन्ति विश्वाश्रया ये त्वयि भक्ति नम्रा:॥
 
अर्थ :- विश्वेश्वरि! तुम विश्व का पालन करती हो। विश्वरूपा हो, इसलिये सम्पूर्ण विश्व को धारण करती हो। तुम भगवान् विश्वनाथ की भी वन्दनीया हो। जो लोग भक्तिपूर्वक तुम्हारे सामने मस्तक झुकाते हैं, वे सम्पूर्ण विश्व को आश्रय देनेवाले होते हैं।
 

 

या श्री: स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मी: पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धि:।
 
श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा तां त्वां नता: स्म परिपालय देवि विश्वम्॥
 
अर्थ :- जो पुण्यात्माओं के घरों में स्वयं ही लक्ष्मीरूप से, पापियों के यहाँ दरिद्रतारूप से, शुद्ध अन्त:करणवाले पुरुषों के हृदय में बुद्धिरूप से, सत्पुरुषों में श्रद्धारूप से तथा कुलीन मनुष्य में लज्जारूप से निवास करती हैं, उन आप भगवती दुर्गा को हम नमस्कार करते हैं। देवि! आप सम्पूर्ण विश्व का पालन कीजिये।
 

 

करोतु सा न: शुभहेतुरीश्वरी शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापद:।
 
अर्थ :- वह कल्याण की साधनभूता ईश्वरी हमारा कल्याण और मङ्गल करे तथा सारी
 

 

सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्ति समन्विते।
 
भयेभ्याहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥
 
एतत्ते वदनं सौम्यं लोचनत्रयभूषितम्।
 
पातु न: सर्वभीतिभ्य: कात्यायनि नमोऽस्तु ते॥
 
ज्वालाकरालमत्युग्रमशेषासुरसूदनम्।
 
त्रिशूलं पातु नो भीतेर्भद्रकालि नमोऽस्तु ते॥
 
अर्थ :- सर्वस्वरूपा, सर्वेश्वरी तथा सब प्रकार की शक्ति यों से सम्पन्न दिव्यरूपा दुर्गे देवि! सब भयों से हमारी रक्षा करो; तुम्हें नमस्कार है। कात्यायनी! यह तीन लोचनों से विभूषित तुम्हारा सौम्य मुख सब प्रकार के भयों से हमारी रक्षा करे। तुम्हें नमस्कार है। भद्रकाली! ज्वालाओं के कारण विकराल प्रतीत होनेवाला, अत्यन्त भयंकर और समस्त असुरों का संहार करनेवाला तुम्हारा त्रिशूल भय से हमें बचाये। तुम्हें नमस्कार है।
 

 

हिनस्ति दैत्यतेजांसि स्वनेनापूर्य या जगत्।
 
सा घण्टा पातु नो देवि पापेभ्योऽन: सुतानिव॥
 
अर्थ :- देवि! जो अपनी ध्वनि से सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त करके दैत्यों के तेज नष्ट किये देता है, वह तुम्हारा घण्टा हमलोगों की पापों से उसी प्रकार रक्षा करे, जैसे माता अपने पुत्रों की बुरे कर्मो से रक्षा करती है।
 

 

शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे।
 
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
 
अर्थ :- शरण में आये हुए दीनों एवं पीडितों की रक्षा में संलग्न रहनेवाली तथा सबकी पीडा दूर करनेवाली नारायणी देवी! तुम्हें नमस्कार है।
 

 

रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्।
 
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति॥
 
अर्थ :- देवि! तुम प्रसन्न होने पर सब रोगों को नष्ट कर देती हो और कुपित होने पर मनोवाञ्िछत सभी कामनाओं का नाश कर देती हो। जो लोग तुम्हारी शरण में जा चुके हैं, उन पर विपत्ति तो आती ही नहीं। तुम्हारी शरण में गये हुए मनुष्य दूसरों को शरण देनेवाले हो जाते हैं।
 

 

जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी।
 
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥
 
अर्थ :- जयन्ती, मङ्गला, काली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, स्वाहा और स्वधा- इन नामों से प्रसिद्ध जगदम्बिके! तुम्हें मेरा नमस्कार हो।
 

 

देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
 
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
 
अर्थ :- मुझे सौभाग्य और आरोग्य दो। परम सुख दो, रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो।
 

 

पत्‍‌नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्।
 
तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम्॥
 
अर्थ :- मन की इच्छा के अनुसार चलनेवाली मनोहर पत्‍‌नी प्रदान करो, जो दुर्गम संसारसागर से तारनेवाली तथा उत्तम कुल में उत्पन्न हुई हो।
 

 

ते सम्मता जनपदेषु धनानि तेषां तेषां यशांसि न च सीदति धर्मवर्ग:।
 
धन्यास्त एव निभृतात्मजभृत्यदारा येषां सदाभ्युदयदा भवती प्रसन्ना॥
 
अर्थ :- सदा अभ्युदय प्रदान करनेवाली आप जिन पर प्रसन्न रहती हैं, वे ही देश में सम्मानित हैं, उन्हीं को धन और यश की प्राप्ति होती है, उन्हीं का धर्म कभी शिथिल नहीं होता तथा वे ही अपने हृष्ट-पुष्ट स्त्री, पुत्र और भृत्यों के साथ धन्य माने जाते हैं।
 

 

सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि।
 
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम्॥
 
अर्थ :- सर्वेश्वरि! तुम इसी प्रकार तीनों लोकों की समस्त बाधाओं को शान्त करो और हमारे शत्रुओं का नाश करती रहो।
 

 

रक्षांसि यत्रोग्रविषाश्च नागा यत्रारयो दस्युबलानि यत्र।
 
दावानलो यत्र तथाब्धिमध्ये तत्र स्थिता त्वं परिपासि विश्वम्॥
 
अर्थ :- जहाँ राक्षस, जहाँ भयंकर विषवाले सर्प, जहाँ शत्रु, जहाँ लुटेरों की सेना और जहाँ दावानल हो, वहाँ तथा समुद्र के बीच में भी साथ रहकर तुम विश्व की रक्षा करती हो।
 

 

प्रणतानां प्रसीद त्वं देवि विश्वार्तिहारिणि। त्रैलोक्यवासिनामीडये लोकानां वरदा भव॥
 
अर्थ :- विश्व की पीडा दूर करनेवाली देवि! हम तुम्हारे चरणों पर पडे हुए हैं, हमपर प्रसन्न होओ। त्रिलोकनिवासियों की पूजनीया परमेश्वरि! सब लोगों को वरदान दो।
 

 

सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्ति भूते सनातनि।
 
गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोऽस्तु ते॥
 
अर्थ :- तुम सृष्टि, पालन और संहार की शक्ति भूता, सनातनी देवी, गुणों का आधार तथा सर्वगुणमयी हो। नारायणि! तुम्हें नमस्कार है।
 

 

शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके।
 
घण्टास्वनेन न: पाहि चापज्यानि:स्वनेन च॥
 
अर्थ :- देवि! आप शूल से हमारी रक्षा करें। अम्बिके! आप खड्ग से भी हमारी रक्षा करें तथा घण्टा की ध्वनि और धनुष की टंकार से भी हमलोगों की रक्षा करें।
 

 

विद्या: समस्तास्तव देवि भेदा: स्त्रिय: समस्ता: सकला जगत्सु।
 
त्वयैकया पूरितमम्बयैतत् का ते स्तुति: स्तव्यपरा परोक्ति :॥
 
अर्थ :- देवि! सम्पूर्ण विद्याएँ तुम्हारे ही भिन्न-भिन्न स्वरूप हैं। जगत् में जितनी स्त्रियाँ हैं, वे सब तुम्हारी ही मूर्तियाँ हैं। जगदम्ब! एकमात्र तुमने ही इस विश्व को व्याप्त कर रखा है। तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है? तुम तो स्तवन करने योग्य पदार्थो से परे एवं परा वाणी हो।
 

 

दारिद्र्यदु:खादिनाश के लिये
 
दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तो: स्वस्थै: स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
 
दारिद्र्यदु:खभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदाऽऽ‌र्द्रचित्ता॥
 
अर्थ :- माँ दुर्गे! आप स्मरण करने पर सब प्राणियों का भय हर लेती हैं और स्वस्थ पुरषों द्वारा चिन्तन करने पर उन्हें परम कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करती हैं। दु:ख, दरिद्रता और भय हरनेवाली देवि! आपके सिवा दूसरी कौन है, जिसका चित्त सबका उपकार करने के लिये सदा ही दया‌र्द्र रहता हो।
 

 

सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
 
शरण्ये ˜यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
 
अर्थ :- नारायणी! तुम सब प्रकार का मङ्गल प्रदान करनेवाली मङ्गलमयी हो। कल्याणदायिनी शिवा हो। सब पुरुषार्थो को सिद्ध करनेवाली, शरणागतवत्सला, तीन नेत्रोंवाली एवं गौरी हो। तुम्हें नमस्कार है।
 

 

सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वित:।
 
मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशय:॥
 
अर्थ :- मनुष्य मेरे प्रसाद से सब बाधाओं से मुक्त तथा धन, धान्य एवं पुत्र से सम्पन्न होगा- इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।
 

ॐ नमो प्रीं पीताम्बराय नमः ||

 

ॐ क्लीं बह्मणे जगदा धाराय नमः ||

 

ॐ हिरण्य गर्भाय अवयक्त रुपिणे नमः ||

 

ॐ क्लीं कृष्णाय नमः ||

 

ॐ गोपालाय उत्तर ध्वजाय नमः ||

 

ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मी नारायणाय नमः ||

 

ॐ महादेव्यै विह्महे दुर्गायै धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ।।

 

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ।।

 

 

शीतले त्वं जगन्माता शीतले त्वं जगत् पिता । 
शीतले त्वं जगद्धात्री शीतलायै नमो नमः ।।
 

सर्वानन्दकरी देवी नारायणि नमोऽस्तुते ।।

 

 

नमः शम्भवे च मयोभवे च नमः शंकाराय च । 
मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च ।।
 

 

गांगं वारि मनोहारि मुरारिचरणच्युतम् । 
त्रिपुरारिशिरश्चारि पापहारि पुनातु माम् ।।
 

 

जले रक्षतु वाराहः स्थले रक्षतु वामनः । 
अटव्यां नारसिंहश्च सर्वतः पातु केशवः ।।
 

 

मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं जनार्दन । 
यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे ।।
 

 

सायं ज्योतिः परं ब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दनः । 
दीपो हरतु मे पापं सन्ध्यादीप नमोऽस्तु ते ।। 
 
शुभं करोतु कल्याणं आरोग्यं सुखसम्पदाम् । 
मम बुद्धिप्रकाशं च दीपज्योतिर्नऽस्तु ते ।।
 

 

अन्नाद् भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसंभवः । 
यज्ञाद भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्म समुद् भवः ।।
 

 

ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् । 
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्म समाधिना ।।
 

 

ॐ भूपतये स्वाहा, ॐ भुवनप, ॐ भुवनपतये स्वाहा । 
ॐ भूतानां पतये स्वाहा ।। 
 
कहकर तीन आहूतियाँ बने हुए भोजन को डालें । 
 
या 
 
।। ॐ नमो नारायणाय ।। 
कहकर नमक रहित अन्न को अग्नि में डालें ।
 

 

त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये । 
गृहाण सम्मुखो भूत्वा प्रसीद परमेश्वर ।।
 

 

अन्नपूर्णे सदा पूर्णे शंकरप्राणवल्लभे । 
ज्ञानवैराग्यसिद्ध्य भिक्षां देहि च पार्वति ।।
 

 

ॐ ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी, भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च ।
गुरुश्च शुक्रः शनिराहु केतवः, सर्वे ग्रहा शान्तिकरा भवन्तु ।।
 

 

यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च । 
तानि तानि प्रणश्यन्ति प्रदक्षिण पदे पदे ।।
 

 

त्वं पुरा सागरोत्पन्नो विष्णुना विधृतः करें । 
निर्मितः सर्वदेवैश्च पाञ्चजन्य नमो5स्तुते ।।
 

 

अश्वत्थाय वरेण्याय सर्वैश्वर्यदायिने । 
अनन्तशिवरुपाय वृक्षराजाय ते नमः ।।
 

 

देवी त्वं निर्मिता पूर्वमर्चितासि मुनीश्वरैः । 
नमो नमस्ते तुलसी पापं हर हरिप्रिये ।।
 

 

अनिध्यं कुरु माले त्वं गृह् णामि दक्षिणे करें । 
जापकाले च सिद्धयर्थें प्रसीद मम सिद्धये ।।
 

 

केशवानन्न्त गोविन्द बाराह पुरुषोत्तम ।
पुण्यं यशस्यमायुष्यं तिलकं मे प्रसीदतु ।।
 
कान्ति लक्ष्मीं धृतिं सौख्यं सौभाग्यमतुलं बलम् ।
ददातु चन्दनं नित्यं सततं धारयाम्यहम् ।।
 
 

 

कनकवर्णमहातेजं रत्नमालाविभूषितम् । 
प्रातः काले रवि दर्शनं सर्व पाप विमोचनम् ।।
 

 

क्षीरोदार्णवसम्भूत अत्रिगोत्रसमुद् भव ।
गृहाणार्ध्यं शशांकेदं रोहिण्य सहितो मम ।।
 

 

अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम् । 
विष्णोः पादोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते ।।
 

 

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतो5पि वा । 
यः स्मरेत पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ।।
 

 

एहि सूर्य सहस्त्रांशो तेजोराशे जगत्पते । 
अनुकम्पय मां देवी गृहाणार्घ्यं दिवाकर ।।
 

 

गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति । 
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलऽस्मिन्सन्निधिं कुरु ।।
 

 

1. ॐ राम ॐ राम ॐ राम । 
 
2. ह्रीं राम ह्रीं राम । 
 
3. श्रीं राम श्रीं राम । 
 
4. क्लीं राम क्लीं राम । 
 
5. फ़ट् राम फ़ट् । 
 
6. रामाय नमः । 
 
7. श्री रामचन्द्राय नमः । 
 
8. श्री राम शरणं मम् । 
 
9. ॐ रामाय हुँ फ़ट् स्वाहा । 
 
10. श्री राम जय राम जय जय राम । 
 
11. राम राम राम राम रामाय राम ।
 

 

हे वासुदेव !
हे नृसिंह !
हे आपादा उद्धारक !
 

 

हृषिकेश गोविन्द हरे मुरारी ! 
हे ! हृषिकेश गोविन्द हरे मुरारी !!
 

 

हे जगन्नाथ ! हे जगदीश !!
हे जगत् पति !! हे जगदाधार !!
 

 

नारायणं सर्वकालं क्षुत प्रस्खलनादिषु । 
ग्रह नक्षत्र पीडाषु देव बाधाषु सर्वतः ।।
 

 

हे चक्रधर !
हे चक्रपाणि !!
हे चक्रायुधधारी !!!
 

 

हे पद्मनाभं सुरेशं । 
हे पद्मनाभं सुरेशं ।
 

 

1. ॐ अनन्ताय नमः । 
 
2. ॐ गोविन्दाय नमः ।
 

 

आयुर्देहि धनं देहि विद्यां देहि महेश्वरि । 
समस्तमखिलां देहि देहि मे परमेश्वरि ।।
 

 

कृष्ण कृष्ण महायोगिन्
भक्तानाम भयंकर 
गोविन्द परमानन्द सर्व मे वश्यमानय ।।
 

 

अच्युतानन्द गोविन्द 
नामोच्चारण भेषजात । 
 
नश्यन्ति सकला रोगाः
सत्यंसत्यं वदाम्यहम् ।।
 

 

ॐ शैलपुत्री मैया रक्षा करो |
ॐ जगजननि देवी रक्षा करो |
ॐ नव दुर्गा नमः |
ॐ जगजननी नमः ||
 
ॐ ब्रह्मचारिणी मैया रक्षा करो |
ॐ भवतारिणी देवी रक्षा करो |
ॐ नव दुर्गा नमः |
ॐ जगजननी नमः ||
 
ॐ चंद्रघणटा चंडी रक्षा करो |
ॐ भयहारिणी मैया रक्षा करो |
ॐ नव दुर्गा नमः |
ॐ जगजननी नमः ||
 
ॐ कुषमाणडा तुम ही रक्षा करो |
ॐ शक्तिरूपा मैया रक्षा करो |
ॐ नव दुर्गा नमः |
ॐ जगजननी नमः ||
 
ॐ स्कन्दमाता माता मैया रक्षा करो |
ॐ जगदम्बा जननि रक्षा करो |
ॐ नव दुर्गा नमः |
ॐ जगजननी नमः ||
 
ॐ कात्यायिनी मैया रक्षा करो |
ॐ पापनाशिनी अंबे रक्षा करो |
ॐ नव दुर्गा नमः |
ॐ जगजननी नमः ||
 
ॐ कालरात्रि काली रक्षा करो |
ॐ सुखदाती मैया रक्षा करो |
ॐ नव दुर्गा नमः |
ॐ जगजननी नमः ||
 
ॐ महागौरी मैया रक्षा करो |
ॐ भक्तिदाती रक्षा करो |
ॐ नव दुर्गा नमः |
ॐ जगजननी नमः ||
 
ॐ सिद्धिरात्रि मैया रक्षा करो |
ॐ नव दुर्गा देवी रक्षा करो |
ॐ नव दुर्गा नमः ||
 

ॐ नमोः नारायणाय. ॐ नमोः भगवते वासुदेवाय ||

 

 

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम |
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ||
 

 

त्वमेव माता  च पिता त्वमेव |
त्वमेव बन्धुश्च  सखा त्वमेव |
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव |
त्वमेव सर्व मम देवदेव ||
 

ॐ नारायणाय सुरसिंहाय नमः ||

 

 

आ कृष्णेन् रजसा वर्तमानो निवेशयत्र अमतं मर्त्य च |
हिरणययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन ||
 

ॐ श्रीं देवकृष्णाय ऊर्ध्वषंताय नमः ||

 

ॐ श्रीं वत्सलाय नमः ||

 

ॐ श्रीं उपेन्द्राय अच्युताय नमः ||

 

 

ॐ श्रीं क्रीं चं चन्द्राय नमः ||
 
 
( 3 माला का जाप प्रतिदिन )
 
रत्न - मोती .
 
भोजन - नमक रहित दही, चावल, दूध , इत्यादि |
 

 

विष्णुप्रिये नमस्तुभ्यं जगद्धिते |
अर्तिहंत्रि नमस्तुभ्यं समृद्धि कुरु में सदा ||
 
OR
 
ॐ श्री महालक्ष्म्यै नमः।|
 

 

ॐ हुं श्रीं मंगलाय नमः ||
 
 
( 3 माला का जाप प्रतिदिन )
 
रत्न - मूंगा .
 
भोजन - नमक रहित बेसन से बना |
 

 

ॐ ऐं स्त्रीं श्रीं बुधाय नमः ||
 
 
( 5 माला का जाप अवश्य करें) 
 
रत्न - पन्ना .
 
भोजन- नमक रहित मूंग से बना |
 

 

मनोजवं मारुततुल्यवेगम् |
जितेन्दि्रयं बुद्धिमतां वरिष्थम् |
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं |
श्री रामदूमं शरण प्रपद्ये ||
 

 

ॐ बृं बृहस्पतये नमः ||
 
 
(3 माला का जाप प्रतिदिन)
 
रत्न - पुखराज .
 
भोजन नमक रहित बेसन से बने पीले पदार्थ |
 

 

ॐ ह्रीं श्रीं शुक्राय नमः ||
 
 
(5 माला का जाप आवश्यक)
 
 
रत्न हीरा. 
भोजन - नमक रहित चावल, दूध दही इत्यादि |
 

 

गायत्री मन्त्र (GAYATRI MANTRA)
 
ॐ भूर्भवः स्वः तत्स वितुर्वरेण्यं |
भर्गोदेवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात् ||
 

 

ॐ ऐं हीं श्रीं श्नैश्चराय नमः ||
 
 
(5 माला का जाप करें)
 
 रत्न- नीलम .
 
भोजन - उड़द व तेल से बने पदार्थ |
 

 

ॐ ऐं ह्नीं राहवे नमः ||
 
 
( 3 माला का जाप करें )रत्न - गोमेद . भोजन - मीठी रोटी, रेवड़ी, तिल से बने पदार्थ |
 

 

ॐ ह्रीं केतव नमः ||
 
 
(3 माला का जाप करें)रत्न - लहसुनिया. भोजन - नमक रहित गेहूँ व तिल से बना हुआ |
 

 

ॐ ग्लां ग्लीं ग्लूं गं गणपतये नम : सिद्धिं मे देहि बुद्धिं
 
प्रकाशय ग्लूं  गलीं ग्लां  फट् स्वाहा||
 
 
विधि :- 
इस मंत्र का जप करने वाला साधक सफेद वस्त्र धारण कर सफेद रंग के आसन पर बैठकर पूर्ववत् नियम का पालन करते हुए इस मंत्र का सात हजार जप करे| जप के समय दूब, चावल, सफेद चन्दन सूजी का  लड्डू आदि रखे तथा जप काल में कपूर की धूप  जलाये  तो  यह मंत्र ,सर्व मंत्रों को  सिद्ध करने  की  ताकत (POWER, शक्ति) प्रदान करता है|
 

श्री गणेश मूल मंत्र (SRI GANESH MOOL MANTRA)

 
ॐ गं गणपतये नमः |
ॐ श्री विघ्नेश्वराय  नमः ||
 

 

ॐ हनुमान पहलवान , वर्ष बारहा का जवान|
 
हाथ में लड्डू, मुख में पान| आओ आओ बाबा हनुमान|
 
न आओ तो दुहाई महादेव गौरा -पार्वती की| शब्द साँचा| 
 
पिण्ड काँचा| फुरो मन्त्र इश्वरो वाचा||
 
विधि :- साधक इस मंत्र का अनुष्ठान मंगलवार या  शनिवार से प्रारम्भ करें| श्री हनुमान विषयक नियम का पालन करते हुए सिन्दूर  का चोला, जनेऊ, खड़ाऊँ, लंगोट, पाँच लड्डू एवं ध्वजा चढ़ावे और प्रत्येक मंगलवार को व्रत रखें| व्रत में एवं जप समय लाल वस्त्र धारण करें, लाल आसन पर बैठ लाल चन्दन की माला का उपयोग करें| प्रति शनिवार गुड़ और चने का वितरण करें तथा यह क्रिया तीन माह करते हुए प्रतिदिन दस मालायें जपें और पवित्रता का ध्यान रखें इससे पवन सुत  प्रसन्न होकर दुर्शन देंगे| उस समय हनुमान जी से जो चाहे माँग लें|
 

 

या देवी सर्वभूतेषु माँ रुपेण संस्थिता |
या देवी सर्वभूतेषु शक्ती रुपेण संस्थिता |
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धि रुपेण संस्थिता |
या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मी रुपेण संस्थिता |
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ||
 

ॐ क्लीं उद् धृताय उद्धारिणे नमः ||

 

 

ॐ नमो भगवते महासुदर्शनाय वासुदेवाय धन्वंतराये:अमृतकलश हस्ताय सर्वभय विनाशाय सर्वरोगनिवारणायत्रिलोकपथाय त्रिलोकनाथाय श्री महाविष्णुस्वरूपश्री धन्वंतरी स्वरूप श्री श्री श्री औषधचक्र नारायणाय नमः॥
अर्थात
परम भगवन को, जिन्हें सुदर्शन वासुदेव धन्वंतरी कहते हैं, जो अमृत कलश लिये हैं, सर्वभय नाशक हैं, सररोग नाश करते हैं, तीनों लोकों के स्वामी हैं और उनका निर्वाह करने वाले हैं; उन विष्णु स्वरूप धन्वंतरी को नमन है।
 

ॐ धन्वंतरये नमः॥

 

 

वन्दे हं शीतलां देवी रासभस्थां दिगम्बराम्।
 
मार्जनीकलशोपेतां शूर्पालङ्कृतमस्तकाम्।।
 
अर्थ है दिगम्बरा, गर्दभ वाहन पर विराजित, शूप, झाड़ू और नीम के पत्तों से सजी-संवरी और हाथों में जल कलश धारण करने वाली माता को प्रणाम हैं। 
 

 

ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी
 
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु‍ते।
 

 

सूर्य मंत्र
 
 
आ कृष्णेन् रजसा वर्तमानो निवेशयत्र अमतं मर्त्य च 
हिरणययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि प
 

 

गायत्री मंत्र
 
 
ॐ भूर्भवः स्वः तत्स वितुर्वरेण्यं
भर्गोदेवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात्
 

 

हनुमान मंत्र
 
 
मनोजवं मारुततुल्यवेगम् 
जितेन्दि्रयं बुद्धिमतां वरिष्थम् 
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं 
श्री रामदूमं शरण प्रपद्ये
 

 

श्री लक्ष्मी मंत्र
 
 
विष्णुप्रिये नमस्तुभ्यं जगद्धिते 
अर्तिहंत्रि नमस्तुभ्यं समृद्धि कुरु में सदा
 

 

श्री विष्णु मन्त्र
 
 
त्वमेव माता  च पिता त्वमेव 
त्वमेव बन्धुश्च  सखा त्वमेव 
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव 
त्वमेव सर्व मम देवदेव 
 

 

श्री गणेश मूल मंत्र
 
 
ॐ गं गणपतये नमः 
ॐ श्री विघ्नेश्वराय  नमः
 

 

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ । 
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्व कार्येषु सर्वदा ।।
 

 

सूर्य पुत्रो दीर्घ देहो विशालाक्षः शिवप्रियः।
 
मन्दचारः प्रसन्नात्मा पीडां हरतु मे शनिः ॥
 

 

 निलान्जन समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम।
 
छायामार्तंड संभूतं तं नमामि शनैश्चरम॥
 
 
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