वट सावित्री व्रत पूजन विधि-Vat Savitri Vrat Pooja Vidhi
 

इस व्रत का प्रारंभ त्रयोदशी तिथि से ही हो जाता है, जिसमें संकल्प के उपरांत तीन दिन तक उपवास किया जाता है, यह संभव न हो तो त्रयोदशी को रात्रि भोजन, चतुर्दशी को अयाचित और अमावस्या को उपवास करके शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को यह व्रत समाप्त करें। यदि किसी कारण से इतना यह भी संभव न हो तो अपने मतानुसार पूर्णिमा/अमावस्या के दिन विधिपूर्वक वट वृक्ष के नीचे इस व्रत को किया जा सकता है।
अपने मतानुसार पूर्णिमा/अमावस्या के दिन वट के समीप बैठ कर बांस के पात्र में सात प्रकार का अनाज भर कर उसे दो वस्त्रों से ढंक दें और दूसरे पात्र में देवी सावित्री तथा सत्य सावित्री की मूर्ति स्थापित करके धूप, दीप, गंध, अक्षत आदि से पूजन किया जाता है। तत्पश्चात वट को सूत लपेटकर विधि पूजा करके परिक्रमा की जाती है। तत्पश्चात इस मंत्र का जप करके अर्घ्य दिया जाता है और सावित्री से अहिवात ( सौभाग्य ) की रक्षाके लिये भक्ति, श्रद्धा और नम्रता सहित प्रार्थना की जाती है। मंत्र है-


'अवैधव्यं च सौभाग्यं देहि त्वं मम सुव्रते । पुत्रान पौत्राश्च सौख्यं च गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते॥'


तत्पश्चात् वट वृक्ष की आराधना इस मंत्र से की जाती है -
'वट सिञ्चामि ते मूलं सलिलैरमृतोपमैः । यथा शाखाप्रशाखाभिर्वृद्धोऽसि त्वं महीतले । तथा पुत्रैश्च सम्पन्नां कुरु मां सदा॥'
तथा पुत्र-पौत्र की इच्छा करने वाली स्त्री इस मंत्र का भी जाप करे। मंत्र है-


पुत्रैश्च पौत्रेश्च संपन्नं कुरू मां सदा।।


इसके बाद वट वृक्ष की परिक्रमा 108, 54 या 17 बार श्रद्धा पूर्वक करना करें।
इसके पश्चात् दीन-हीन एवं ब्राह्मणों को यथोचित वस्त्र आदि देकर भोजन कराएं एवं उनसे आशीर्वाद लें। यदि वहां गाय या अन्य पशु-पक्षी हों, तो सभी को भोजन कराएं। पूड़ी, लड्डू, शर्बत आदि का भी दान करना घर में संपन्नता लाता है। अत: होने पर यह कार्य भी करें। इस दिन कुछ जगहों पर रात्रि में चौदह द्विज दंपतियों अर्थात ब्राह्मण-ब्राह्मणियों को भोजन भी कराया जाता है। स्त्रियों को इस दिन मधुर एवं सुंदर रीति से पकाया भोजन ग्रहण करना चाहिए। बह्मा प्रिया सावित्री एवं बह्मा को भी मधुर भोजन का भोग लगाना चाहिए। इस दिन अपने घर आकर पितरों का श्रद्ध भी करना चाहिए, ताकि उनका आशीर्वाद मिलता रहे।
स्त्रियों को घी एवं दूध में बने पुए, सेवई, खजूर के पुए एवं गुड़ के पुए बनाकर खाना एवं खिलाना चाहिए। इससे स्त्रियां अत्यंत प्यारी धन-धान्य युक्त होती हैं एवं उनका सुहाग अचल रहता है।

 
 
 
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