सावन सोमवार व्रत का उद्यापन
 

सोमवार व्रत का उद्यापन यानि संकल्प लिए गए व्रत की संख्या का पूरा होना। सोमवार व्रत का उद्यापन श्रावण मास के प्रथम या तीसरे सोमवार को करना सबसे अच्छा माना गया है। वैसे सावन, कार्तिक, वैशाख, ज्येष्ठ या मार्गशीर्ष मास के किसी भी सोमवार व्रत का उद्यापन किया जा सकता है। धार्मिक दृष्टि से यह व्रत भगवान शिव, पार्वती और चन्द्रदेव के विशेष कृपा और अंत में मुक्ति के लिए लगातार चौदह वर्ष तक करने का शास्त्रों में विधान है। इस व्रत के उद्यापन में उमा-महेश और चंद्रदेव का संयुक्त रुप से पूजन और हवन किया जाता है।

- सुबह स्नान कर सफेद कपड़े पहनकर पूजा के लिए केले के खंबों का सुन्दर मण्डप बनाया जाता है।

- सफेद वस्त्रों, फूलों और आम के पत्तों से इस मण्डप को सजाएं और घी के कुछ दीपक जलाएं।

- किसी विद्वान ब्राह्मण से उसमें वेदी बनाकर भगवान शिव, पार्वती और चन्द्रदेव को स्थापित करवाकर उनका विधिवत पूजन कराएं। चंद्रदेव सौंदर्य, ज्योति, सरसता और मधुर गुणों के स्वामी है। इसलिए सोमवार व्रत और उद्यापन में सुंदरता एवं सफेद वस्तुओं का विशेष महत्व है।

- शास्त्रीय विधान के अनुसार इस व्रत के उद्यापन में पूजा के बाद हवन भी किया जाना चाहिए।

- हवन में तिल, जो और घी में हवन सामग्री मिलाकर दो सौ साठ आहुतियाँ दी जाती है।

- आहुतियाँ देते समय त्र्यंबक नम: मंत्र का बोलें।

- उद्यापन में कम से कम उतने ब्राह्मणों को भोजन तो कराना ही चाहिए जितने वर्ष तक आपने यह व्रत किया है, वैसे अधिक की कोई सीमा नहीं है।

- जिन मूर्तियों एवं पात्रों का प्रयोग आप पूजा में करते रहे हैं, वे सभी यज्ञ कराने वाले ब्राह्मण को दे दी जाती है तथा सभी ब्राह्मणों को यथाशक्ति दक्षिणा और वस्त्र आदि।

 
 
 
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