|| Maa Bangalamukhi Aarti ||
 

जय जयति सुखदा, सिद्धिदा, सर्वार्थ - साधक शंकरी। स्वाहा, स्वधा, सिद्धा, शुभा, दुर्गानमो सर्वेश्वरी ।।जय सृष्टि-स्थिति-कारिणि-संहारिणि साध्या सुखी।शरणागतो-अहंत्राहि माम् , मांत्राहि माम् बगलामुखी।।

जय प्रकृति-पुरूषात्मक-जगत-कारण-करणि आनन्दिनी।विद्या-अविद्या, सादि-कादि, अनादि ब्रह्म-स्वरूपिणी।।ऐश्वर्य-आत्मा-भाव-अष्टम, अंग परमात्मा सखी।शरणागतो-अहंत्राहि माम्, मां त्राहि माम् बगलामुखी।।

जय पंच-प्राण-प्रदा-मु दा, अज्ञान-ब्रह्म-प्रकाशिका। संज्ञान-धृति-अज्ञान-मति-विज्ञान-शक्तिविधायिका ।।जय सप्त-व्याहृति-रूप, ब्रह्म विभू ति शशी-मुखी ।शरणागतो अहंत्राहि माम्, मांत्राहि माम् बगलामुखी।।


आपत्ति-अम्बुधि अगम अम्ब! अनाथ आश्रयहीन मैं।।पतवार श्वास-प्रश्वास क्षीण, सुषुप्त तन-मन दीन मैं।।षड्-रिपु-तरंगित पंच-विष-नद, पंच-भय-भीता दुखी।शरणाग शरणाग शरणाग शरणागतो-अहंत्राहि माम्, मांत्राहि माम्बगलामुखी।। तो-अहंत्राहि माम्, मांत्राहि माम्बगलामुखी।। तो-अहंत्राहि माम्, मांत्राहि माम्बगलामुखी।।



जय परमज्योतिर्मय शुभम् , ज्योति परा अपरा परा।
नैका, एका, अनजा, अजा, मन-वाक्-बुद्धि-अगोचरा।।
।पाशांकु शा, पीतासना, पीताम्बरा, पंकजमुखी।
।शरणागतो-अहंत्राहि माम्, मांत्राहि माम् बगलामुखी।।





भव-ताप-रति-गति-मति-कुमति, कत्र्तव्य कानन अति घना।अज्ञान-दावानल प्रबल संकट विकल मन अनमना।
।दुर्भाग्य-घन-हरि, पीत-पट-विद्यु  त झरो करूणा अमी।
शरणागतो-अहंत्राहि माम्, मांत्राहि माम् बगलामुखी।।


हिय-पाप पीत-पयोधि में, प्रकटो जननि पीताम्बरा!।
तन-मन सकल व्याकुल विकल, त्रय-ताप-वायु भयंकरा।।।अन्तःकरण दश इन्द्रियां, मम देह देवि! चतुर्दशी।।शरणागतो-अहंत्राहि मा शरणागतो-अहंत्राहि मा शरणागतो-अहंत्राहि मा शरणागतो-अहंत्राहि माम्, मांत्राहि माम् बगलामुखी।।


दारिद्रय-दग्ध-क्रिया, कुटिल-श्रद्धा, प्रज्वलित वासना।
अभिमान-ग्रन्थित-भक्तिहार, विकारमय मम साधना।।अज्ञान-ध्यान, विचार-चंचल, वृत्ति वैभव-उन्मुखी।
शरणागतो-अहंत्राहि माम्, मांत्राहि माम् बगलामुखी।।