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ग्रहयुक्त अथवा द्रष्ट मुन्थाफल

 

 

यदि मुन्था सूर्य की राशि (सिंह) मे हो और सूर्य के साथ या उससे द्रष्ट हो, तो जातक को उस वर्ष राज्य मे सम्मान मिलता है |
राज्य-कर्मचारियों से मित्रता बढ़ती है, विवाह होता है, ससुराल से द्रव्य प्राप्त होता है तथा भोग-विलास की प्रचुरता रहती है |
 
यदि मुन्था कर्क राशि मे चन्द्रमा के साथ अथवा चन्द्रमा द्वारा देखा जाता हो, तो उस वर्ष जातक स्वास्थ्य की प्राप्ति करता है, यश की वृद्धि होती है तथा सोचे हुए कार्य सम्पन्न होते हैं, परन्तु यदि पापग्रह की द्र्ष्टि हो, तो मानसिक क्लेस और चिन्ता बढ़ती  है |
 
यदि मुन्था मेष और वृश्चिक राशि मे मंगल के साथ या मंगल द्वारा दृष्ट हो, तो उस वर्ष जातक कई प्रकार की बीमारियाँ सहन करता है | वह युद्ध मे अपंग होता है या उसका अंग-भंग होता है | कृषि-कार्यों मे हानि होती है एवं कई प्रकार की परेशानियाँ उसे चिन्तित बनाये रखती हैं |
 
यदि मुन्था मिथुन और कन्या राशि मे बुध के साथ या उसके द्वारा दृष्ट हो, तो जातक परीक्षा मे पास होता है | साक्षात्कार मे सफल होता है एवं राज्य में उन्नति करता है |
यदि जातक लेखक, कवि या उपन्यासकार हो, तो वह अपनी कृति से विशेष यशोपार्जन करता है |
 
यदि मुन्था धनु या मीन राशि में ब्रहस्पति के साथ या उसके द्वारा देखा जाता हो, तो जातक को पुत्र तथा स्त्री का विशेष सुख प्राप्त होता है | वस्त्रादि के व्यापार से जातक लाभ प्राप्त करता है | ऐसे इत्थशाल योग भी हो, तो जातक को राज्य-सुख प्राप्त होता है |
 
यदि मुन्था वृष और तुला राशि पर शुक्र से युक्त या दृष्ट हो, तो जातक तीर्थ-लाभ प्राप्त करता है | समाज में सम्मान बढ़ता है तथा धर्मादि कार्यों में उसकी रूचि बढ़ती है|
 
यदि मुन्था मकर या कुम्भ राशि में शनि से युक्त या दृष्ट हो, तो जातक वाद-सम्बन्धी  बिमारियों से ग्रस्त रहता है | उस वर्ष वह किसी वाहन-दुर्घटना का शिकार होता है और विभन्न रोगों से ग्रस्त रहता है |
 
यदि मुन्था राहु या केतु के साथ हो, तो उस भाव से जैसा फल होता है, वैसा ही फल मिलता है | राहु व केतु 'मुन्था' के साथ निर्लिप्त रहते हैं |
 
जो ग्रह जन्मकाल मे बलवान और वर्षफल मे निर्बल हों, वे वर्ष के पूर्वार्द्ध में शुभ और वर्ष के उत्तरार्ध में अशुभफल देते हैं | इसके विपरीत जो ग्रह जन्म में निर्बल और वर्ष में बलवान होते हैं, वे वर्ष कि पूर्वार्द्ध में अशुभ तथा उत्तरार्ध में शुभफल देते हैं, परन्तु यदि दोनों समय मे एक-से ही होते हैं, तो सम्पूर्ण वर्ष मे वैसा ही फल देते रहते हैं |
 
मुन्था का स्वामी ६, ७, ८वें या ४थे स्थान में हो, वक्री, अस्तगत, या पापग्रह से युक्त या दृष्ट हो, तो वह भाव शुभफल न देकर रोगोत्पति एवं धन-हानि ही कराता है |
 
यदि मुन्थेश वर्षलग्न से अष्टमेशयुक्त या १, ४, ७, १० भाव के ग्रह से युक्त यदि दृष्ट हो, तो भी वह भाव शुभफल नही देता |
 
यदि जन्मकाल में मुन्था या मुन्थेश शुभग्रह से युक्त या दृष्ट हों, तो पूर्वार्द्ध मे ही शुभफल नहीं देते हैं | इसी प्रकार वर्षकाल में मुन्था या मुन्थेश शुभग्रह से युक्त या दृष्ट हों, तो वर्ष के पूर्वार्द्ध में शुभफल देते हैं |